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मैं कहता सुरझावनहारी

आज मैं आपके समक्ष मनु -स्मृति लेकर आई हूं। जिसमें आक्रांताओं के प्रभाव में हमारे ही पंडितों और पुरोहितों ने इतनी मिलावट कर दी है कि उसे जाति विशेष का पोषक माना जाता है। संस्कृत भाषा के मर्म को जानने के कारण मुझे इस के कथनों में विरोधाभास स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। कारण आप मिलावट कर सकते हैं […]

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सच्चिनंद हीरानंद वात्स्यायन (अज्ञेय)

‘ शेखर एक जीवनी ‘ , ‘ नदी के द्वीप ‘ , ‘ अपने अपने अजनबी ‘ , हरी घास पर क्षण भर ’ , ‘ कितनी नावों में कितनी बार ‘ जैसी प्रमुख कृतियों के रचनाकार

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धर्म कहां है?

मैं पूछती हूं खुद से अक्सर धर्म कहां है ? पूजा , विविध व्रतों , उपवासों में पुरोहित या धर्म गुरुओं के पास नैष्ठिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों में उपासना के बिके हुए फूलों में हमारे दिखावटी उसूलों में।

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तारीख

तारीखों का फैशन सा चल पड़ा है जन्म से लेकर मृत्यु तक हर क्षण का मूल्य हम चुकाते रहते हैं। एक तारीख़ का अनुभव क्या कभी दूसरे से मैच करता है? कुछ तारीखों हमें मालामाल करती हैं, वहीं कुछ कंगाल कर जाती हैं