सामाजिक विषमता 

इतिहास की अपेक्षा कविता सत्य के अधिक निकट होती है। भूमंडलीकरण ने दुनिया को छोटा बनाया साथ ही साथ बाजारों को सजाया जहां इंसानियत छोटी होती जा रही है समाज में उच्च और नीच की गहरी खाई जन्म ले चुकी है हम एक तरफ वैभवशाली जीवन भोग रहे हैं और कहीं भूख से रोज लड़ाई होती है मेरी प्रस्तुत कविता इसी स्थिति पर व्यंग प्रस्तुत करती है :-

१. शीर्षक :-“ सूख रही स्याही कविता से”

कैसे बुनू बिंबों के जाल

कैसे खींचू शब्दों के छाल

मिथक ढूंढू क्यों अतीतगत

दंतकथा क्यों खोजू कालातीत।

क्या है यही कलेवर कविता का ?

यह जैसे माया रूप हो बनिता का

छल लेती है सभ्य जनों को

माया बंधन में बांध गई सबको।

शब्द फांस नहीं बनते मुझसे

भावना है उस दीन के लिए।

सम अवसर मिला होता उसे अगर

भाग्य का नारायण होता वह।

कर्म करते हाथ उस श्रमिक के

लगातार हाड़ तोड़ कर के भी

नहीं जुटा पाते रोटी भात।

कहीं रोता यौवन ,कहीं बिलखता बचपन।

अभावों की नियति ,भूख से रोज लड़ाई

नहीं मिली फिर भी भरपूर बड़ाई।

नियति के मारे ये हाथ

बढ़ गए लिए भीख कटोरा

हाथ कर बेकार उसकासभ्य समाज ने छोड़ा।


२. शीर्षक :-“सच या झूठ पता नहीं”

वो बात तो झोपड़ी और सच्चाई की करते हैंमगर कितने झोपड़ों से ताल्लुक रखते हैं?

हमारी सादगी उन्हें गरीबी लगती है।

लोग रंगों की परतों में

सीरत कहां परखते हैं?

झूठ में हम तुम बस

रचे बसे रहते हैं।


३. शीर्षक :-“जिंदगी की यही कहानी है”

घर भरा है ऐशो-आराम के

साजो-सामान से

किंतु कहीं कुछ खाली है;

समझ में आता नहीं है

क्या असली क्या जाली है?

हर वक्त सालती हमको ख्वाहिशें

आज यह कल वह चाहिए

पूरी जिंदगी की यही कहानी है।


४. शीर्षक :-“ मृत संवेदना प्रखर प्रवंचना”

महत्वाकांक्षा का मोती पलता है

निष्ठुरता के सीप में।

सहन नहीं कर पाता

अपने अवरोधों को ;

कत्ल कर देता है उनका

जो उसे खतरे का संशय लगते हैं ।

सफलता के ये कुतुबमीनारें

बनी हैं शोषितों के खून से ,

शाहों के जुनून से ।

“हर सफल यहां भावना का व्यापारी है”।

रेत ही रेत , नेहनिर्झर बह चुका है ।

अर्थ के प्रमाद , उन्माद का नित्य प्रदर्शन!

दिखती है बस-

“मृत संवेदना प्रखर प्रवंचना।”


५. शीर्षक :- “धर्म कहां है”

मैं पूछती हूं खुद से अक्सर

धर्म कहां है ?

पूजा , विविध व्रतों , उपवासों में

पुरोहित या धर्म गुरुओं के पास

नैष्ठिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों में

उपासना के बिके हुए फूलों में

हमारे दिखावटी उसूलों में।

नहीं नहीं नहीं

धर्म करणीय – अकरणीय

उपयुक्त – अनुपयुक्त पर विचार

कराने वाला विवेक है ।

मानवता की अलख जगाता संदेश है ।


2 विचार “सामाजिक विषमता &rdquo पर;

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

w

Connecting to %s

%d bloggers like this:
search previous next tag category expand menu location phone mail time cart zoom edit close