दार्शनिक कविताएं

१. शीर्षक:- “परीक्षा भवन”

हाथ में पश्नपत्र लिए

सवालों के सुलझे – अनसुलझे

गुत्थ – म – गुत्थ में उलझे

कुछ जवाबों को हल करते

कुछ को टालते

कभी आत्मविश्वास से गौरवान्वित

कभी हार के डर से

शू्न्य को निहारते

समय की पाबंद आंखों में

टकटकी से निहारते

तभी घड़ी ने कहा –

आपका वक्त पूरा हुआ ।


२. शीर्षक :-“पी कहां -पी कहां…. ”

प्राण पपीहा पूछ रहा है

पी कहां – पी कहां . . . .

अतृप्ति , बेचैनी , जिजीविषा बलवती फिर भी

हर रोज मांगना

प्यास फिर भी ,

घन आए लाए नेह जल

किंतु नहीं मिटती प्यास अमर ।

पी – पी कर भी

प्राण पपीहा टेरता रहता

पी कहां – पी कहां ।।


३. शीर्षक:-“ स्मृतियां सावन की . . . .”

स्मृतियां सावन की . . . . .

काम आई पतझड़ में

हर व्यथा डाल से विलगने की

सहा हमने नए सृजन के लिए ।

मन हारा नहीं डाल का

पुरानी पत्तियां खाद बनेंगी

थोड़ा दर्द सहना होगा

पवन थपेड़ों में रहना होगा

अंदर आंसू लिए मन में

कुछ ऊर्जा सुलगाकर

उमंगों की उष्मा सहजाकर

धैर्य से रखा डाल ने

समय बदला उसका

आज उस ठूठ पर

कोपलें उगने लगीं।

सुख-दुख की

आंख मिचौली जीवन

विष पीकर ही

अमृत बनता शिवत्व ।।


४. शीर्षक:-“ लंका स्वर्णमयी भी जल गई”

बड़ा बड़ा अभागा था विभीषण

रोक सका ना राघव प्रलय

नीति पथ और धर्म का

हर पग पर करता पालन।

अहंकार बीज देता है स्वर्णिम फल

पर उपजता नाश भूमि पर सकल।

दस शीश चढ़ा रावण ने

मनोहर रचा महल,

जानता था बंधु उसका यह

सीता सती का अभिशाप

खा जाएगा पूरा वैभव

नष्ट करेगा राक्षस जाति को।

बार-बार जान अनिष्ट को

मनाता रहा मानी अग्रज ।

उसने अपमान गरल पीकर

जब छोड़ा लंका घर

देखा नाचते काल को

लंका और रावण के सिर पर ।


५. शीर्षक :- “सच कहूं तो..”

बहुत डूबा मेरा मन भी

जग की छलनामयी धारा में

सेमर पुष्प समान यह जग मुझे चलता रहा।

कीर को देख कर

हंस पड़ी खुद पर

वह भी मेरी गलती दुहरा रहा।


६. शीर्षक :- “जीत की बारी है”

गुल की चाह है तो

कांटो को भी सहना होगा

सुख की छाव है तो

दुखों को भी सहना होगा

जीवन के इस धूप छांव में

हर शख्स जूआरी है

कभी हार कर भी

दाव लगाते हैं हम

हार के बाद जीत की बारी है ।


६. शीर्षक :- “अभाव

अभावों की परछाई

आजकल आदमी के साथ

दिन भर रहती है।

भरते-भरते अपना थैला

थककर रात में जब वह सोता है

स्वप्न में दूसरा अभाव होता है।


७. शीर्षक :-“ शब्द ही ब्रह्म है”

शब्द है ब्रह्म रूप

अर्थ उसका प्रकाश

शब्द अर्थ से परे

नहीं जीवन – विकास ।

हम बोल रहे हैं अनवरत

खोल रहे हैं खुद को

वह जो चुप है वीर वही

शब्दों से हारा जो व्यक्ति नहीं ।।


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