घनेरी छांव

कैसे कहूं मेरी तपती,

साखों पर आओ तुम,

छांव नहीं सिर्फ आशा की कोपलें फूटी हैं।

औरों की छाया में

गुजार लो दिन चार ।

कल जब कोपलें फूलों और पत्तों से लदकर

मजबूत दरख्त बन जाएं;

आ जाना तुम मेरी घनेरी छांव में

उस घनेरी छांव में फिर अपना नीड़ बनाना।।


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