दर्द जब बढ़ जाता है

दर्द जब बढ़ जाता है तो नींद चली जाती है

दर्द के कम होने की उम्मीद चली जाती है।

क्या कहूं हालत ए जिगर मैं

इसकी आदत है मचलने की

कहां तक रोकूं निगाहों को

इनकी आदत है फिसलने की

मचलने और फिसलने की ज़िद्द नहीं जाती।

जज़्बात को बढ़ने न दीजै

उल्फत का नशा चढ़ने न दीजै

दिल पत्थर होता तो संभल जाता

आपकी नसीहतों से बहल जाता

मेहरबां आप ही कुछ करते की दीद चली जाती है।

मैंने खाए हैं धोखे बहुत तेरी फ़िराक़ में,

ऐ इल्तजाओं ! ऐ आरजूओं !

बेखुदी के जख्म हैं बहुत इस ताक में

कि करें हमला-ए-नसीबों

भूले गर जख्म तो दर्द-ए-खरीद नहीं जाती।


Advertisements

2 thoughts on “दर्द जब बढ़ जाता है

Add yours

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

Create a website or blog at WordPress.com

Up ↑

%d bloggers like this: