प्रतिमानाटकम् से आज तक

प्रतिमानाटकम् का प्रथम अंक जिसमें भास अपनी मौलिकता का परिचय देते हुए परिहासवश सीता को वल्कल पहनते हुए दिखाते है। प्रसंग यह है कि राज्याभिषेक से पूर्व एक सखी कुछ वल्कल (गेरुआ साधु के वस्त्र) लेकर आती है। सीता को यह वस्त्र बहुत सुंदर लगते हैं। सीता उन्हें पहन लेती हैं।

उसके उपरांत कुछ देर बाद राम आते हैैं । राम भी वल्कल पहनना चाहते हैं। सीता राम को मना करते हुए कहती हैं- “आर्य आपका राज्याभिषेक होने वाला आप इसे नहीं पहन सकते। यह अपशकुन होगा”। राम सीता से आग्रह करते हुए जो तर्क देते है वह बड़ा समीचीन है – “देवी तुमने स्वयं वल्कल पहन कर मेरे आधे शरीर को तो वल्कल पहना ही दिया है। अब इसे पूर्ण कर दो।”

यही आशय है जो माननीय भूल बैठे हैं। हमारे यहां पति, भर्ता, आर्य, वर कुछ संबोधन प्राप्त होते हैैं:-

पति – जो रक्षा करे।

भर्ता – जो भरण – पोषण करें।

आर्य – जो श्रेष्ठ हो।

वर – जो चयन के योग्य हो।

आज इनमें से कौन सा संबोधन उपयुक्त है ? अपने आप में विवादास्पद प्रश्न है। मेरा आशय सुप्रीम कोर्ट द्वारा आर्टिकल 497 को खत्म करने से है। माननीय न्यायलय ने बहुत अच्छा कदम उठाया है।

पुरुष सूक्त – में पुरुष ब्रह्म ही सृष्टि का जनक है। यह बताता है कि ऋगवेद काल में स्त्री – पुरुष के भेद नहीं थे। बाईबल में भी गॉड के एडम और ईव को स्वर्ग से निष्कासित करने से पहले से दोनों जुड़े हुए थे।

समाज में पुरुष वर्ग प्रभावी रहा है। हर धर्म व राष्ट्र उनके अधीन हैं। बहुविवाह एक ऐसा सत्य है जो हर धर्म में बहुतायत में पाया जाता है। पुरुष वर्ग ने सदैव पत्नी से अधिक अन्येतर संबंधों को तवज्जो दी है। समाज का श्रेष्ठ वर्ग यही भूल गया कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’। आप श्रेष्ठ हो तो आपका अनुसरण व अनुकरण होगा ही।

बीसवीं सदी में स्त्री ने अपने अधिकारों की लेकर जागरूकता आयी तो उन्हें ये नागवार गुजरा। उन्हें कुछ ठप्पे (tattoos or deboos) भी अच्छे नहीं लगे :-


“Man for the field. Woman for the hearth. ”

— Tennyson


निखिल गोविंद की पुस्तक ‘बिटवीन लव एंड फ्रीडम’ में उन्होंने बीसवीं सदी के अधिकतर महिला उपन्यासकरों का विषय लव एंड फ्रीडम बताया है, जो कि शतप्रतिशत सत्य है।

कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय समाज कि वर्तमान दशा को दर्शाता है। महानगरी जीवन में यह सत्य दिखता है। मैं खुद मानती हूं कि “पत्नी पुरुष की सम्पत्ति नहीं है”। आप उच्छृंखल और स्वछंद होकर दूसरे को नैतिकता का पाठ कैसे पढ़ा सकते हैं?

“Respect the women”

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