मां मुझे माफ करना

Introduction:- मेरी मां और मुझ में अंतर है केवल सहशीलता का। मां जानती है कि घर में सब कुछ ठीक नहीं है लेकिन वह विरोध की बजाय सब कुछ सहकर बहुत से अपराधों को बढ़ावा देती है। जो कुछ व्यभिचार, उन्माद व उद्दंडता आज समाज में दिख रही है उसकी जिम्मेदारी उस मां की भी है जो ग़लत को ग़लत कहने का साहस नहीं जुटा पाती। अन्याय के समक्ष उसका यह समर्पण मुझे कतई मंजूर नहीं।


मां मुझे माफ करना !

मैं नहीं सह सकती तुम्हारे जितना

मैं नहीं मार सकती खुद को

मैं जल नहीं सकती तिल – तिल

मैंने सीखा काटना – सिलना

बनाना छप्पन भोग तुम्हारी तरह।

तुम्हारे तरेरने पर ओढ़े रखी – अपनी मर्यादा।

मां मुझे माफ करना !

मैं नहीं घोट सकती गला – अपने अरमानों का

मुझे चांद चाहिए वह भी पूरा

मुझे अपने अरमानों की अल्पना बनानी है।

मां मुझे माफ करना !

मैं नहीं रख सकती करवा – चौथ

मैं नहीं मानती खुद को दासी।

मुझे नहीं चाहिए सम्मान थोड़ा

मैं लूंगी तुम्हारा आधा हिस्सा।

वजूद हूं मैं दुनिया का

तुम में समाई शक्ति स्वरूपा शिवा।

मां मुझे माफ करना !

मैं नहीं कर सकती त्याग

मैं नहीं कर सकती मजदूरी

मैं नहीं कर सकती जी हुजूरी!

मुझे नहीं चाहिए देवी के पद

मुझे नहीं सहनी गालियों की बौछार।

मुझे चिढ़ है अपनी कमजोरी पर!

मुझे चिढ़ है तुम्हारी दबंगई से

मां मुझे माफ करना !

मैं नहीं मानती भगवान पति को

मैं नहीं ढ़क सकती निर्लज्जता उसकी

मैं नहीं सहूंगी उसकी बेवफाई उसकी।

मां! मैं तेरी परछाई हूं

मगर उसमें साहस ,प्रतिरोध डालकर

मुझे तुझ से आगे बढ़ना है

खुद को सशक्त करना है।


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8 thoughts on “मां मुझे माफ करना

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  1. खूबसूरत ।काश ऐसा सोच सभी नारियों का हो पाता तो वैसे नामर्द जो अपनी मर्दानगी दिखाते हैं चाहे वे संख्या में अधिकतम या कम ही क्यों ना हों घुटने पर जरूर आ जाते।उत्तम रचना।👌👌

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