मुझको एक बात बताना

मुझको एक बात बताना

सच कहना, दिल से कहना

मुझे सुनना है तुम्हारा जवाब

सियासी, फरेबी नहीं बनना।

क्या दुआ के भी रंग होते है?

इबादत, पूजा करके तुम इंसान ही न बन सके!

शोर – शराबे और दिखावे का परचम लहराकर,

खून अपनों का बहाकर,

खुद को खुदा मान बैठे!

किताबें धूल खा चुकी

जाने कितने पन्नों को दीमक चाट गई!

मेरे पड़ोस में राम, रहमान और पीटर

सब के घर हैं।

सबके चूल्हे जलते हैं।

सबकी परेशानी एक है –

‘ कैसे जुटाए दो जून की रोटी और छत? ’

कोई फसाद नहीं जब तक राम, रहमान से बड़ा,

पीटर न समझे सबसे बड़ा खुदको।

सियासत के दंगे जब तक न भड़के।

सबके पास चिंताएं हैं।

सब दुख में एक होते हैं।

आसूं का रंग नहीं होता!

आंखों से बहता दुख एक सा ही होता है।

मजहबी उन्मादों में मेरा पड़ोस टूटकर

बिखर जाता है।


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Categories: Social inequality

5 replies

  1. Beautiful… Really meaningful piece of work… Gr8 mam. 🙂

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  2. Really thoughtful and too beautiful 👍🏻👍🏻

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