मैं पूछती हूं खुद से अक्सर

धर्म कहां है ?

पूजा , विविध व्रतों , उपवासों में

पुरोहित या धर्म गुरुओं के पास

नैष्ठिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों में

उपासना के बिके हुए फूलों में

हमारे दिखावटी उसूलों में।

नहीं नहीं नहीं

धर्म करणीय – अकरणीय

उपयुक्त – अनुपयुक्त पर विचार

कराने वाला विवेक है ।

मानवता की अलख जगाता संदेश है


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8 Comments »

  1. जहाँ श्रीकृष्ण होते है धर्म वहां होता है।।

    पर श्रीकृष्ण कहां है ये सबसे बड़ा प्रश्न!!! श्रीमद्भगवत गीता में लिखा है :-

    नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च
    मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद

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  2. बहुत ही खूबसूरत लिखा है आपने।।।।।दिल को छू गई पंक्तियाँ।

    सिंघासन का उलटफेर,
    जाति-धर्म और साम्राज्यवादी सोच तले
    मिटती और पनपती सभ्यताएँ,
    धर्मांधों की गरजती तलवारों के सामने
    आज भी घुटनों के बल सिसकती इंसानियत,
    उपासना के स्थलों एवं पुजारियों की बढ़ती अम्बार
    मगर दिल में रहम का नामोनिशान नहीं
    फिर भी लोग कहते हैं
    धर्म जिंदा है,
    धर्म तो वहाँ जिंदा है जहाँ कोई
    मंदिर,मस्जिद हो ना हो
    मगर जब कोई
    भूखा,प्यासा,बेबस,मजबूर तड़पता हो
    और सहारे को हजारों हाथ
    उठ खड़े होते हैं।

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