मैं पूछती हूं खुद से अक्सर

धर्म कहां है ?

पूजा , विविध व्रतों , उपवासों में

पुरोहित या धर्म गुरुओं के पास

नैष्ठिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों में

उपासना के बिके हुए फूलों में

हमारे दिखावटी उसूलों में।

नहीं नहीं नहीं

धर्म करणीय – अकरणीय

उपयुक्त – अनुपयुक्त पर विचार

कराने वाला विवेक है ।

मानवता की अलख जगाता संदेश है


Advertisements

8 Comments »

  1. धर्म की सटिक व्याख्या आपने की है ।
    आहारनिद्रा भयमैथूनंच, सामान्यमेतत् पशूभिर्नराणाम्।
    धर्मो ही एको, तेषामधिको, धर्मेविहीण पशूभिसमानाः।।
    Dharma is the only difference between us humans and animals. Dharma here means Vivek. We can judge the difference between good and bad, right and wrong. Geeta describes it as thus “व्यवसायात्मिका बुद्धि”.

    Liked by 2 people

  2. धर्म कहां है- जो धारण किया जाता है वो धर्म है । धारण करने योग्य केवल और केवल श्री कृष्ण हि है और श्री कृष्ण कितनी प्यारी बात कहें है
    नाहं वसामि वैकुंठे योगिनां हृदये न च मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद
    कृष्ण न तो वैकुण्ठ में निवास करते है और न ही योगीजनो के ह्रदय में। कृष्ण तो उन भक्तों के पास सदैव रहते है जहाँ उनके भक्त कृष्ण चित्त में और तन्मय होकर कृष्ण को भजते है।

    Liked by 2 people

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s