The imitative poet who aims at being popular is not by nature made, nor is his art intended,

to please or to affect the rational principle in the soul ; but he will prefer the passionate and fitful temper, which is easily limited….

-Plato


राजे अपनी रखवाली की;

किला बनाकर रहा;

बड़ी- बड़ी फौजें रखीं।

चापलूस कितने सामंत आए।

मतलब की लकड़ी पकड़े हुए।

कितने ब्राह्मण आए

पोथियों में जनता को बांधे हुए।

कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए,

लेखकों ने लेख लिखे,

ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे,

नाट्य – कलाकारों ने कितने नाटक रचे

रंगमंच पर खेले।

जनता पर जादू चला राजे के समाज का

लोक – नारियों के लिए रानियां आदर्श हुईं।

धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ।

लोहा बजा धर्म पर ,सभ्यता के नाम पर।

खून की नदी बही।

आंख – कान मूंदकर जनता ने डुबकियां लीं।

आंख खुली – राजे अपनी रखवाली की।।

Nirala


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5 Comments »

  1. 👌👌👌 पढ़ना पड़ेगा अब तो निराला जी को ☺️☺️बेहतरीन है…plato भाई का quote bhi👌👌

    We create our own demon’s….
    भीड़ अंधी होती हैं ,भावनाओ से ग्रसित ,सरदार प्रेम में आत्ममुग्ध ….
    सरदार भी उसका भरपूर इस्तेमाल करता है,और समय समय पर मनोरंजन और जोश कम नहीं होने देता।।।

    समझदार लोग दूर खड़े होकर भीड़ और सरदार प्रेम का विश्लेषण करते है।।।

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