Enlighten yourself- 10

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Hello everyone welcome to another new wonderful post of mine. That’s what it feels to me.

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स्वर्गीय अटल जी को उनके जन्मदिवस पर मेरा नमन..

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अटल जी आपकी जयंती पर अपको मेरा नमन । आज आप के जैसे व्यक्तित्व की ही आवश्यकता है।आपके कथन और कविता को आपकी भावांजलि का माध्यम बना रहीं हूं-

“हार नहीं मानूंगा,रार नहीं ठानूंगा।

काल के कपाल पर लिखता हूं -मिटाता हूं,

गीत नया गाता हूं।”

“आदमी को चाहिए वह जूझे / परिस्थितियों से लड़ें

एक स्वप्न टूटे / तो दूसरा गढ़े।”

“दांव पर सब कुछ लगा , रूक नहीं सकते / टूट सकते हैं ,

मगर हम झुक नहीं सकते।”

“इससे फर्क नहीं पड़ता/कि आदमी कहां खड़ा है/

पथ पर या रथ पर/

तीर पर या प्राचीर पर /

फर्क इससे पड़ता है कि/

जहां खड़ा है/

या जहां उसे खड़ा होना पड़ा है/

उसका धरातल क्या है?”

” होना न होना एक ही सत्य के/

दो आयाम हैं ,शेष सब समझ का फेर है/

बुद्धि के व्यायाम हैं ।”

“जो जितना ऊंचा/

उतना ही एकाकी होता है,

हर भार वह स्वयं ही ढोता है।”

उपरोक्त पंक्तियों में उनका महिमा मंडित व्यक्तित्व झलक रहा है। उस महान राजनीतिज्ञ को बार-बार सहस्र बार प्रणाम 🙏🙏🙏🏵️🏵️🌹🌹

धन्यवाद आप सबका 🙏🙏

Happy anniversary!!

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A year passed, but lessons received from here will stay throughout my life. And most importantly, WordPress gifted me a

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whole new world with simply amazing friends. Friends who have now become my life’s treasures! Thank you so very much for all your love, care and support.

I feel more lucky than happy, to be a part of this amazing world of WordPress family.The support you all have given me, is very much appreciated. Thank you very much. May this support of yours always be with me.

Tons of Thanks to all you wonderful and amazing people, who made this journey so easy and fun and beautiful!


Thanks a ton!


मृत संवेदना प्रखर प्रवंचना

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महत्वाकांक्षा का मोती पलता है

निष्ठुरता के सीप में।

सहन नहीं कर पाता

अपने अवरोधों को ;

कत्ल कर देता है उनका

जो उसे खतरे का संशय लगते हैं ।

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धर्म कहां है?

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मैं पूछती हूं खुद से अक्सर

धर्म कहां है ?

पूजा , विविध व्रतों , उपवासों में

पुरोहित या धर्म गुरुओं के पास

नैष्ठिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों में

उपासना के बिके हुए फूलों में

हमारे दिखावटी उसूलों में।

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Happy children’s Day

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छलक रहा था स्नेह अमल दृगपटों से

अनभिज्ञता झांक रही थी अक्षकोरों से।

अपनी धुन में था बेपरवाह,

समझता खुद को शहंशाह

अल्हड़ता ,चंचलता और मस्ती में।

वह गुम था अपनी बस्ती में।

यह बस्ती नहीं मजहबी

वह तो था निरपेक्षी।

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🎆Happy Deepawali🎆

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नमस्कार दोस्तों। इस पावन पर्व पर में आप सबके समक्ष अपनी एक कविता प्रस्तुत करना चाहती हूं:-

कपड़े, मिठाई और पटाखे खरीदकर,

त्यौहार के लिए तैयार हो जाएं।

दुख के अंधेरे दूरकर,

खुशियों के दीप जलाएं।

दीपावली की आपको हार्दिक शुभकानाएं।

नफरत को दिल से दूरकर,

परायों को अपना बनाएं।

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खाली हाथ लौटाया गया हूं

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यूं ही चलते चलते…….. कुछ हटकर :-

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मैं उनके दर से ठुकराया गया हूँ !
नसीहत देके बहकाया गया हूँ !!
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यहीं जन्नत सजा ली शेख़ जी ने !
मैं वादे पर ही बहलाया गया हूँ !!
————————————–
भले करती हों आंखें क़त्ल उनकी !
मगर मुजरिम मैं ठहराया गया हूँ !!
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लिखाया है रपट थाने में , शायद !
मैं उसके दिल में फिर पाया गया हूँ!!
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मेरी नाकामियों खुशियां मनाओ !
मैं खाली हांथ लौटाया गया हूँ !!
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—–Khursheed Alam ——–


प्रतिमानाटकम् से आज तक

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प्रतिमानाटकम् का प्रथम अंक जिसमें भास अपनी मौलिकता का परिचय देते हुए परिहासवश सीता को वल्कल पहनते हुए दिखाते है। प्रसंग यह है कि राज्याभिषेक से पूर्व एक सखी कुछ वल्कल (गेरुआ साधु के वस्त्र) लेकर आती है। सीता को यह वस्त्र बहुत सुंदर लगते हैं। सीता उन्हें पहन लेती हैं।

उसके उपरांत कुछ देर बाद राम आते हैैं । राम भी वल्कल पहनना चाहते हैं। सीता राम को मना करते हुए कहती हैं- “आर्य आपका राज्याभिषेक होने वाला आप इसे नहीं पहन सकते। यह अपशकुन होगा”। राम सीता से आग्रह करते हुए जो तर्क देते है वह बड़ा समीचीन है – “देवी तुमने स्वयं वल्कल पहन कर मेरे आधे शरीर को तो वल्कल पहना ही दिया है। अब इसे पूर्ण कर दो।”

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Happy Gandhi Jayanti!!

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आप सभी को गांधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। इस शुभ पर्व पर हमारे प्यारे बापू का जन्म हुआ था। इस पावन अवसर पर मैं अपनी कविता ‘बापू अब तुम ही बोलो’ को पुनः प्रस्तुत करना चाहूंगी :-


चेहरे से मानुष हैं सब

संवेदन रहित ह्रदय के करतब।

छल छद्म द्वेष के शिकार।

हर पग पर हो खुद का विस्तार

साजिशों की घिनौनी हरकत।

मिटा कर बड़ी लकीरें

काट कर गला किसी सरल का

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Happy Eid – al – adha!

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आप सभी को ईद की शुभकामनाएं। ईद के इस शुभ अवसर पर में आपके समक्ष श्री केदारनाथ जी की एक कविता प्रस्तुत करना चाहूंगी:

हम सब मिलकर ईद मनायें
सबकी उम्मीदों पर छायें
जग में ऐसे प्यार लुटायें
हम सब मिलकर ईद मनायें
नेक बनेंगे एक बनेंगे
भेद नहीं प्यार करेंगे
नाचें गायें धूम मचायें

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Happy Friendship day!

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मैथिलीशरण गुप्त की सुन्दर रचना:

तप्त हृदय को , सरस स्नेह से ,
जो सहला दे , मित्र वही है।

रूखे मन को , सराबोर कर,
जो नहला दे , मित्र वही है।

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हरियाली साड़ी ओढ़े मां धरती को मेरा नमन!

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सावन में हर तरफ हरियाली ही नजर आती है। बारिश की बूंदें पेड़ों पर गिरते हुए मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। हवा के झोंको के साथ हिलते-डुलते ये वृक्ष और उनसे फूटती स्वर लहरियां तथा बारिश के कारण कातर हो छांह और ठौर तलाशते पक्षी मुझे अत्यंत मनोरम लगते हैं। प्रकृति अनुपम सुन्दरी है। प्रतिपल प्रतिक्षण जो नवीन है कला प्रेमी उसे ही सुन्दर कहते हैं। प्रकृति बिना भेदभाव के सबको सुख देती है। हवा की लहरियों पर हिलते-डुलते वृक्ष मुझे बहुत आकर्षक लगते हैं। कुछ पंक्तियां उन पर लिख रहीं हूं-

थिरकते हैं द्रुम हवा के ताल पर

विहवल होकर ,

प्रत्येक डाली ,वल्लरी नाच रही

कितनी रोमांचक है यह थिरकन!

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दर्द जब बढ़ जाता है

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दर्द जब बढ़ जाता है तो नींद चली जाती है

दर्द के कम होने की उम्मीद चली जाती है।

क्या कहूं हालत ए जिगर मैं

इसकी आदत है मचलने की

कहां तक रोकूं निगाहों को

इनकी आदत है फिसलने की

मचलने और फिसलने की ज़िद्द नहीं जाती।

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मुझे छोड़ दो इस दर्द के साथ अकेला

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मुझे छोड़ दो इस दर्द के साथ अकेला

भरम ना दिखाओ अपनेपन का बहुत

तुम भी हो खालिस बातों का रेला

मुझे छोड़ दो इस दर्द के साथ अकेला।।

हर डोर रिश्तो की रेशमी तारों से बनी

जाने कब टूट जाए, रह जाए दिल अकेला

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Meaning of being a women

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This can be my personal opinion because the great men have been the first to contribute to the fight for women’s rights. They always encouraged the women to protect their dignity and their existence. In India, the woman was kept before men, but the invaders made us beast and brutal and we forgot morality and humanity. Today the meaning of being a woman has changed. Somewhere, our upbringing is responsible for our present scenario : –

The more I keep these barriers aside,
The more they overtake me.
The meaning of being a woman
Is to accept these boundaries somehow
From childhood to death
These protective cages secure us
but also have their own conditions
To follow them is a woman’s destiny.
These boundaries made us women weak and dependent!
Giving birth to the world from its womb
Nowadays in every way, is being exploited

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एक औरत होने के मायने

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यह मेरी व्यक्तिगत राय हो सकती है क्योंकि औरतों के हक की लड़ाई में महापुरुषों का ही सर्वप्रथम योगदान रहा। उन्होंने स्त्रियों को उनकी गरिमा और अपने अस्तित्व की रक्षा करने को सदैव उद्यत किया। भारत में स्त्री को पुरुषों से पहले रखा जाता था किन्तु आक्रान्ताओं ने हमें अपसंस्कृति के जाल में ऐसा उलझाया की हम अपना मूल स्वरूप ही भूल बैठे ! आज औरत होने के मायने बदल गए हैं। हमारी परवरिश ही हमें कहीं न कहीं दुर्बल बनाती है-

कितना भी किनारे रख दूं

इन बाड़ों को,

ये सामने आ ही जाते है

एक औरत होने के मायने

इन बाड़ों को किसी न किसी तरह स्वीकार करो ।

बचपन से लेकर मौत तक

ये सुरक्षा के बाड़े हमारा साथ देते हैं

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वाजश्रवा के बहाने

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“वाजश्रवा के बहाने” कवि कुंवर नारायण की अति प्रसिद्ध आख्यायिका है। आक्सफाम के एक सर्वे के अनुसार विश्व की आधी संपत्ति पर केवल एक प्रतिशत लोगों का कब्जा है। प्रोफेसर थामस पिकेटी के अनुसार अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन में आर्थिक विषमता तेजी से बढ़ रही है। भारत में भी स्थिति कमोबेश वैसी ही है। कुंवर नारायण की पंक्तियों को जब मैं ने इस संदर्भ में उपयुक्त पाया तो इसे आपके समक्ष प्रस्तुत करने से खुद को रोक नहीं पाई

तुम्हें खोकर मैं ने जाना

हमें क्या चाहिए -कितना चाहिए

क्यों चाहिए, संपूर्ण पृथ्वी

जबकि उसका एक कोना बहुत है

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आदमी

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परिंदे घूमते हैं बेख़ौफ , खौफज़दा बस आदमी है।

बड़ी शख्सियत देखकर

न अंदाजा लगाना उसकी ताकत का

सुनहरे लिबासों में भी गमज़दा बस आदमी है।

चमकती सीढ़ियां कामयाबी की

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रविन्द्रनाथ टैगोर

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जीवन में जो पूजाएं पूरी नहीं हो सकती हैं , मैं ठीक जानता हूं कि वे भी खो नहीं गई हैं। जो फूल खिलने से पहले ही पृथ्वी पर झड़ गया है, जो नदी मरुभूमि के मार्ग में ही अपनी धारा को खो बैठती है,-मैं ठीक जानता हूं कि वे भी खो नहीं गई हैं। जीवन में आज भी जो कुछ पीछे छूट गया है, जो कुछ अधूरा रह गया है, मैं ठीक जानता हूं कि वह भी व्यर्थ नहीं हो गया है। मेरा जो भविष्य है , जो अब भी अछूता रह गया है,वे तुम्हारी वीणा के तार में बज रहे हैं, मैं ठीक जानता हूं , ये भी खो गये हैं-

जीवने यत पूजा हतो न सारा,

जानि हे जानि ताओ हय नि हारा।

ये फल ना फुटिते झरेछे धरणी

ये नदी मरूपथे हारालो धारा।

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ये शहर है जनाब……….

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ख्वाब ढूंढतें हैं वो रातें अब भी

जो नानी के किस्से कहानियों

में जगा करती थीं।

रात भर जगमगाते थे जुगनू

नीम के पेड़ों के पास

जाने कहां गुम हो गई वो रातें

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गौरैया

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अहे ! तुम कौन प्रिये ?

सुरभित बगिया की रखवार

रश्मियों से पूर्व जगती

करती अभिनंदन सूर्य का

जाने क्या कहती हो तुम

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फूल

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फूल खिलते हैं

जहां को महकाने के लिए

कितना सुंदर होता है खिलना

हंसी उनकी कुछ पल ही रहती है

समय उनकी सुंदरता ले लेता है

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मृत संवेदना प्रखर प्रवंचना

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महत्वाकांक्षा का मोती पलता है

निष्ठुरता के सीप में।

सहन नहीं कर पाता

अपने अवरोधों को ;

कत्ल कर देता है उनका

जो उसे खतरे का संशय लगते हैं ।

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सूख रही स्याही कविता से

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कैसे बुनू बिंबों के जाल

कैसे खींचू शब्दों के छाल

मिथक ढूंढू क्यों अतीतगत

दंतकथा क्यों खोजू कालातीत।

क्या है यही कलेवर कविता का ?

यह जैसे माया रूप हो बनिता का

छल लेती है सभ्य जनों को

माया बंधन में बांध गई सबको।

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धर्म कहां है

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मैं पूछती हूं खुद से अक्सर

धर्म कहां है ?

पूजा , विविध व्रतों , उपवासों में

पुरोहित या धर्म गुरुओं के पास

नैष्ठिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों में

उपासना के बिके हुए फूलों में

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स्मृतियां सावन की …….

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स्मृतियां सावन की . . . . .

काम आई पतझड़ में

हर व्यथा डाल से विलगने की

सहा हमने नए सृजन के लिए ।

मन हारा नहीं डाल का

पुरानी पत्तियां खाद बनेंगी

थोड़ा दर्द सहना होगा

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अभाव

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अभावों की परछाई

आजकल आदमी के साथ

दिन भर रहती है।

भरते-भरते अपना थैला

थककर रात में जब वह सोता है

स्वप्न में दूसरा अभाव होता है।


परीक्षा भवन

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हाथ में पश्नपत्र लिए

सवालों के सुलझे – अनसुलझे

गुत्थ – म – गुत्थ में उलझे

कुछ जवाबों को हल करते

कुछ को टालते

कभी आत्मविश्वास से गौरवान्वित

कभी हार के डर से

शू्न्य को निहारते

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मन

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मन भटकाता है

मन विरमाता है

हर काम से पहले

मन हमको आजमाता है।

जीतूंगा या हारूंगा

जय पराजय के संशय में

मन हमको उलझाता है

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भरम ही भरम

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हम नाहक ही सबको अपना समझते रहे

छोटी सी मुट्ठी में जहां नहीं समाता।

चांद दूर ही रहे तो सही

पास जाकर कहीं टूट न जाए

उसकी सुन्दरता का भरम।

कभी भरम को भी ढोओ ,

शायद सच का सामना

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विचार क्यों नहीं आते

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क्यों विचार लिखते समय

साथ नहीं देते

वे सुखद स्मृतियों की तरह,

काफूर हो जाते हैं।

वे आते हैं जब धोती रहती हूं,

बच्चों के कपड़े।

वे आते हैं जब करती रहती हूं,

घर के खर्च का हिसाब।

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हम आधुनिक है

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दूर से आती

किसी विदेशी ब्रांड के परफ्यूम की खुशबू

चाह जगी देखा तो थी शिखा सजी

छोटे टॉप पर टाइट जींस

हल्के लिपस्टिक ,मस्कारा के साथ

बालों को ढीला बांध लगा ली मैच की बिंदी।

बालकनी से झांक -झांक

कह रही थी ‘स्टुपिड नहीं आया अभी’।;

सीढ़ी से उतर रही थी जब –

आकुलता देख पूछा बरबस

कहां जा रही हो? वह भी इस निखार के साथ!

तमतमा कर बोली –

‘फेर दिया पानी सारी मेहनत पर

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तारीख

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तारीखों का फैशन सा चल पड़ा है

जन्म से लेकर मृत्यु तक

हर क्षण का मूल्य हम चुकाते रहते हैं।

एक तारीख़ का अनुभव

क्या कभी दूसरे से मैच करता है?

कुछ तारीखों हमें मालामाल करती हैं,

वहीं कुछ कंगाल कर जाती हैं

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