पी कहां – पी कहां

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प्राण पपीहा पूछ रहा है

पी कहां – पी कहां . . . .

अतृप्ति , बेचैनी , जिजीविषा बलवती फिर भी

हर रोज मांगना

प्यास फिर भी ,

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परीक्षा भवन

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हाथ में पश्नपत्र लिए

सवालों के सुलझे – अनसुलझे

गुत्थ – म – गुत्थ में उलझे

कुछ जवाबों को हल करते

कुछ को टालते

कभी आत्मविश्वास से गौरवान्वित

कभी हार के डर से

शू्न्य को निहारते

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मन

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मन भटकाता है

मन विरमाता है

हर काम से पहले

मन हमको आजमाता है।

जीतूंगा या हारूंगा

जय पराजय के संशय में

मन हमको उलझाता है

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भरम ही भरम

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हम नाहक ही सबको अपना समझते रहे

छोटी सी मुट्ठी में जहां नहीं समाता।

चांद दूर ही रहे तो सही

पास जाकर कहीं टूट न जाए

उसकी सुन्दरता का भरम।

कभी भरम को भी ढोओ ,

शायद सच का सामना

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विचार क्यों नहीं आते

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क्यों विचार लिखते समय

साथ नहीं देते

वे सुखद स्मृतियों की तरह,

काफूर हो जाते हैं।

वे आते हैं जब धोती रहती हूं,

बच्चों के कपड़े।

वे आते हैं जब करती रहती हूं,

घर के खर्च का हिसाब।

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हम आधुनिक है

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दूर से आती

किसी विदेशी ब्रांड के परफ्यूम की खुशबू

चाह जगी देखा तो थी शिखा सजी

छोटे टॉप पर टाइट जींस

हल्के लिपस्टिक ,मस्कारा के साथ

बालों को ढीला बांध लगा ली मैच की बिंदी।

बालकनी से झांक -झांक

कह रही थी ‘स्टुपिड नहीं आया अभी’।;

सीढ़ी से उतर रही थी जब –

आकुलता देख पूछा बरबस

कहां जा रही हो? वह भी इस निखार के साथ!

तमतमा कर बोली –

‘फेर दिया पानी सारी मेहनत पर

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तारीख

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तारीखों का फैशन सा चल पड़ा है

जन्म से लेकर मृत्यु तक

हर क्षण का मूल्य हम चुकाते रहते हैं।

एक तारीख़ का अनुभव

क्या कभी दूसरे से मैच करता है?

कुछ तारीखों हमें मालामाल करती हैं,

वहीं कुछ कंगाल कर जाती हैं

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बापू अब तुम ही बोलो

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चेहरे से मानुष हैं सब

संवेदन रहित ह्रदय के करतब।

छल छद्म द्वेष के शिकार।

हर पग पर हो खुद का विस्तार

साजिशों की घीनौनी हरकत।

मिटा कर बड़ी लकीरें

काट कर गला किसी सरल का

बन गए सफलता के शिखर

‌‌ उजाड़ दिया भारती के कानन को।

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मां

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मां ईश्वर की सबसे सुंदर कृति है।

मां दुनिया की सबसे बेहतर अभिव्यक्ति है।

मां ममता से सारी दुनिया चलती है।

मां संसार शिशु की लोरी थपकी है।

मां सृष्टि का नींव आधार है।

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असलियत

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बहुत रोए जानकर असलियत

शायद भरम ही ठीक था

मत मुखौटों को उठाओ अब

जानती हूं कत्ल करने वाला –

ईमान का ; मेरा ही मीत था ।

शिनाख्त पैरवी करूं कैसे ?

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बाजार

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पहले तो ईमान को बेचा

अब अंदर के इंसान को बेचो!

यौवन बगिया में आग लगाकर

मासूमियत के भगवान को बेचो।

बाजार बन गई दुनिया सारी

बिकें तन यौवन के

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