Category Archives: Social inequality

सूख रही स्याही कविता से

कैसे बुनू बिंबों के जाल

कैसे खींचू शब्दों के छाल

मिथक ढूंढू क्यों अतीतगत

दंतकथा क्यों खोजू कालातीत।

क्या है यही कलेवर कविता का ?

यह जैसे माया रूप हो बनिता का

छल लेती है सभ्य जनों को

माया बंधन में बांध गई सबको।

शब्द फांस नहीं बनते मुझसे

भावना है उस दीन के लिए।

सम अवसर मिला होता उसे अगर

भाग्य का नारायण होता वह।

कर्म करते हाथ उस श्रमिक के

लगातार हाड़ तोड़ कर के भी

नहीं जुटा पाते रोटी भात।

कहीं रोता यौवन ,कहीं बिलखता बचपन।

अभावों की नियति ,भूख से रोज लड़ाई

नहीं मिली फिर भी भरपूर बड़ाई।

नियति के मारे ये हाथ

बढ़ गए लिए भीख कटोरा

हाथ कर बेकार उसकासभ्य समाज ने छोड़ा।


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धर्म कहां है

मैं पूछती हूं खुद से अक्सर

धर्म कहां है ?

पूजा , विविध व्रतों , उपवासों में

पुरोहित या धर्म गुरुओं के पास

नैष्ठिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों में

उपासना के बिके हुए फूलों में

हमारे दिखावटी उसूलों में।

नहीं नहीं नहीं

धर्म करणीय – अकरणीय

उपयुक्त – अनुपयुक्त पर विचार

कराने वाला विवेक है ।

मानवता की अलख जगाता संदेश है