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1000 likes completed!!

I am so excited to tell you about the new milestone we have reached! 1000 likes!

Thank you so much.I really appreciate your attention and support from the bottom of my heart.

Thanks for your support!

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जीवन की सीख

नम्रता दिखाते हुए चलना
सद्गुण अपनाते हुए चलना
दर्प के साथ तो चलते है बहुत
तुम अपना सर झुकाते हुए चलना।
थोड़ा शरमाते हुए चलना
थोड़ा मुस्काते हुए चलना
रिश्ते हर कोई बनता है
तुम निभाते हुए चलना।
प्रेम गीत गुनगुनाते हुए चलना
परायों को अपना बनाते हुए चलना
दुनिया में हैवानियत कम है क्या?
इंसानियत का धर्म अपनाते हुए चलना।


By :- सुयश शुक्ला

Blogger’s Recognition Awards

Hello everyone this is Rachana Tripathi from the blog Rachana Trp., and I am very grateful to Mr. Ayush Kumar for nominating me for Blogger’s Recognition Awards.

He is a fantastic blogger and I really recommend you all to visit his site. The link to his site his site is given below :

https://shayarkhana.wordpress.com


My Story:

Writing poems was one of my most favourite hobbies. I have been writing poems since when I was in my college, and I wrote my first poem at the age of 16 years.

Since that time, I have completed nearly a diary by writing poems. But they were of no use, until my son gave me the idea of creating a blog and uploading those poems on it.

And after that time I started my blog at 18th of January, 2018. And you all know what happened next.


Advices for Beginners :

The two things that I want to share with Beginners are :

  • Stay consistent and don’t lose hope: no one gets success on the first try. Always keep trying until you gain enough attention and keep posting.
  • Give enough attention to your viewers: always keep in mind that your visitors are in your blogging. So always think about your users and never post anything that you think can hurt their sentiments.

Rules for the Awards :

  • Thank the blogger who nominated you.
  • Make a post to show your award.
  • Tell how you got in this blogging world.
  • Give some advices for new bloggers
  • Nominate 15 other bloggers of your choice.
  • Inform them about their nomination.

Bloggers whom I have nominated :

Names and blogs of the bloggers whom I have nominated are given below :

  1. Nilesh Kumar143 http://www.nileshkumar143.wordpress.com
  2. Araysuvada.com. http://www.aryansuvada.com
  3. Superior_soch. http://www.superiofazal.wordpress.com
  4. Luxus Lazarz . http://gotteslieblingmensch.co
  5. The Blogging Bihari. http://www.the-bloggin.bihari.com
  6. Daneelyunus.
  7. http://www.daneelyunus.com
  8. Vishal Chhatrola.http://www
  9. Shubham Singh. http://www.india1stblog.ooo
  10. Sourabh Nareti. http://www.naretisourabh.wordpress.com
  11. Melrose. http://www.melrosejordan.blog.com
  12. Bollywood News. http://www.bollywoodnews37.wordpress.com
  13. Life beyond Imagination. http://www.lifebeyondimaginattion16wordpress.com
  14. Ashish Kavita. http://www.ashishkavita.com
  15. Mukund bhatt. http://www.kuchdiaryse.com

Thank you very much Ayush Kumar ji for nominating me.


Happy Janmashtmi

वेणु अपने कर लिया
सप्त रंध्रों में सप्तसुर लिए
वैजंती माल उर लिए
श्याम गात मनोहर लिए
द्युति कांति सम पीताम्बर लिए
धेनु असंख्य ग्वाल हर लिए
त्रिभंगी मूर्ति काम मनोहर लिए
बस जाओ नंदलाल मेरे मन में
नित जागत सोवत दरस तुम्हारी
कर पाऊं अधम कपटी नारी
तर जाऊं बस अबकी बारी।

🙏आप सबको जनमास्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।🙏

Happy Eid – al – adha!

आप सभी को ईद की शुभकामनाएं। ईद के इस शुभ अवसर पर में आपके समक्ष श्री केदारनाथ जी की एक कविता प्रस्तुत करना चाहूंगी:

हम सब मिलकर ईद मनायें
सबकी उम्मीदों पर छायें
जग में ऐसे प्यार लुटायें
हम सब मिलकर ईद मनायें
नेक बनेंगे एक बनेंगे
भेद नहीं प्यार करेंगे
नाचें गायें धूम मचायें
हम सब मिलकर ईद मनायें
मीठी-मीठी सिवई खिलायें
सब अधरों पर खुशियाँ लायें
प्यार करो त्यौहार सिखायें
हम सब मिलकर ईद मनायें


हमको,
तुमको,
एक-दूसरे की बाहों में
बँध जाने की
ईद मुबारक।


बँधे-बँधे,
रह एक वृंत पर,
खोल-खोल कर प्रिय पंखुरियाँ
कमल-कमल-सा
खिल जाने की,
रूप-रंग से मुसकाने की
हमको,
तुमको
ईद मुबारक।


और
जगत के
इस जीवन के
खारे पानी के सागर में
खिले कमल की नाव चलाने,
हँसी-खुशी से
तर जाने की,
हमको,
तुमको
ईद मुबारक।


और
समर के
उन शूरों को
अनुबुझ ज्वाला की आशीषें,
बाहर बिजली की आशीषें
और हमारे दिल से निकली-
सूरज, चाँद,
सितारों वाली
हमदर्दी की प्यारी प्यारी
ईद मुबारक।


हमको,
तुमको
सब को अपनी
मीठी-मीठी
ईद-मुबारक।


Wish you a Happy Eid !

हे मां भारती शत-शत नमन तुम्हें

हे मां भारती शत – शत नमन तुम्हे।

उर का हर स्पंदन करे नमन तुम्हे।

तेरी गोद मुझे हर जनम मिले

ओढू टरा बसंती बाना।

हे जगवंदीनी शत – शत नमन तुम्हे।

राग – द्वेष से परे नेह से भरे हुए

अपने पुत्रों को तूने सदा दुलारा।

हे तपसिंधुनी शत – शत नमन तुम्हे।

रसमई तू, चिन्मय तू, तू आनंदलोक

वीरों की, मनीषियों का आदिस्रोत।

हे वेदगायनिनी शत – शत नमन तुम्हे।


तंज के पत्थर

मैंनेतंज के,

हर पत्थर को सम्हाल कर रख लिया।

जिन्होंने मेरे सपनों को चकनाचूर किया,

मेरे अरमानों का लहू निकाला

क्योंकि ये पत्थर ना थे मेरे लिए।

तंज के पत्थर मेरे इरादों की

पक्की सड़क बनाएंगे।


Happy Friendship day!

मैथिलीशरण गुप्त की सुन्दर रचना:

तप्त हृदय को , सरस स्नेह से ,
जो सहला दे , मित्र वही है।

रूखे मन को , सराबोर कर,
जो नहला दे , मित्र वही है।

प्रिय वियोग ,संतप्त चित्त को ,
जो बहला दे , मित्र वही है।

अश्रु बूँद की , एक झलक से ,
जो दहला दे , मित्र वही है।


🙏🏻🙏🏻सुप्रभात🙏🏻🙏🏻

हरियाली साड़ी ओढ़े मां धरती को मेरा नमन!

सावन में हर तरफ हरियाली ही नजर आती है। बारिश की बूंदें पेड़ों पर गिरते हुए मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। हवा के झोंको के साथ हिलते-डुलते ये वृक्ष और उनसे फूटती स्वर लहरियां तथा बारिश के कारण कातर हो छांह और ठौर तलाशते पक्षी मुझे अत्यंत मनोरम लगते हैं। प्रकृति अनुपम सुन्दरी है। प्रतिपल प्रतिक्षण जो नवीन है कला प्रेमी उसे ही सुन्दर कहते हैं। प्रकृति बिना भेदभाव के सबको सुख देती है। हवा की लहरियों पर हिलते-डुलते वृक्ष मुझे बहुत आकर्षक लगते हैं। कुछ पंक्तियां उन पर लिख रहीं हूं-

थिरकते हैं द्रुम हवा के ताल पर

विहवल होकर ,

प्रत्येक डाली ,वल्लरी नाच रही

कितनी रोमांचक है यह थिरकन!

मृदुल अंग डोल रहे नर्तक से

भाव-भंगिमा भी अनुपम

नशे में धुत बावले हो नाचते हैं पात सब

हवा के मल्हार , सावन या कजरी के राग सुर पर।

बहुत ही मनमोहक है यह नर्तन।

सावन अब भी आता है लेकिन कजरी और झूलों के बग़ैर।

इन पेड़ों की थिरकन मुझे बहुत भाती है।

मुठ्ठी भर आसमां

मुठ्ठी भर आसमां चाहिए।

सागर न मिले ना सही

एक छोटा सा दरिया चाहिए।

जिंदगी एक सिलसिला है

ताउम्र जिंदगी ना सही

जिंदगी आलीशां चाहिए।

खौफ नहीं दुनिया का

ये तो तमाशाई है

बंदगी के वास्ते खुदा चाहिये।

ख्वाबों की दुनिया नहीं

अपनों का साथ ही बहुत

हकीक़त का जहां चाहिए।

मुखालफ़त की परवाह नहीं

फरेबों पे आह नहीं

कोई तो रहनुमा चाहिए।

दर्द जब बढ़ जाता है

दर्द जब बढ़ जाता है तो नींद चली जाती है

दर्द के कम होने की उम्मीद चली जाती है।

क्या कहूं हालत ए जिगर मैं

इसकी आदत है मचलने की

कहां तक रोकूं निगाहों को

इनकी आदत है फिसलने की

मचलने और फिसलने की ज़िद्द नहीं जाती।

जज़्बात को बढ़ने न दीजै

उल्फत का नशा चढ़ने न दीजै

दिल पत्थर होता तो संभल जाता

आपकी नसीहतों से बहल जाता

मेहरबां आप ही कुछ करते की दीद चली जाती है।

मैंने खाए हैं धोखे बहुत तेरी फ़िराक़ में,

ऐ इल्तजाओं ! ऐ आरजूओं !

बेखुदी के जख्म हैं बहुत इस ताक में

कि करें हमला-ए-नसीबों

भूले गर जख्म तो दर्द-ए-खरीद नहीं जाती।


मुझे छोड़ दो इस दर्द के साथ अकेला

मुझे छोड़ दो इस दर्द के साथ अकेला

भरम ना दिखाओ अपनेपन का बहुत

तुम भी हो खालिस बातों का रेला

मुझे छोड़ दो इस दर्द के साथ अकेला।।

हर डोर रिश्तो की रेशमी तारों से बनी

जाने कब टूट जाए, रह जाए दिल अकेला

मुझे छोड़ दो इस दर्द के साथ अकेला।।

दर्द दर्द थम जाएगा खुद-ब-खुद आदतन

छोड़ जाएगा नमी सी आंखों में

एक तरफ होंगी वीरानियां

उस तरफ लगा है तमाशाई मेला

मुझे छोड़ दो इस दर्द के साथ अकेला।।


रिश्तों की शर्तें

रिश्तों की थी कुछ ऐसी शर्तें

जिनको हम अपना न सके ।

गैरों को भी बनते देखा दोस्त

हम अपनों से भी निभा ना सके ।

आंसू बहा लिये, जी हल्का हो गया

गम को फिर भी भुला ना सके ।

वक्त ने तराशा, ढल गए हम

दाग चेहरे से अपने मिटा ना सके ।

लिखा कुछ, शायद बन गया कुछ

गीत अपने ही गा ना सके ।

कोशिश की लाखो ं, सहा कांटो को

चमन अपना महका न सके ।


Some famous Statements

Here are some inspiring statements from famous personalities:-


Half of our mistakes arise from feeling where we are ought to think, and thinking where we are ought to feel. ” —J.C. Collins


“All sins have their origin in a sense of inferiority, otherwise called ambition.” — Cesare Pavese


“If you aspire to the highest place, it is no disgrace to stop at the second place, or even the third.”

— Jonathan Swift


कमज़ोरी

क्या-क्या अरमां, क्या-क्या सपने।

आज सबकांच के मानिंद टूट गए ।

बादल आसमां में टिकते कब तक

किस्मत उनकी छान , बरसने की

खानाबदोशों के पराया घर फिर छूट गए ।

दोष तुम्हें दें क्या; गलती अपनी

हमारी नरमी कमज़ोरी जानने वाले-

मीत ही खुला घर पा कर लूट गए।


Meaning of being a women

This can be my personal opinion because the great men have been the first to contribute to the fight for women’s rights. They always encouraged the women to protect their dignity and their existence. In India, the woman was kept before men, but the invaders made us beast and brutal and we forgot morality and humanity. Today the meaning of being a woman has changed. Somewhere, our upbringing is responsible for our present scenario : –

The more I keep these barriers aside,
The more they overtake me.
The meaning of being a woman
Is to accept these boundaries somehow
From childhood to death
These protective cages secure us
but also have their own conditions
To follow them is a woman’s destiny.
These boundaries made us women weak and dependent!
Giving birth to the world from its womb
Nowadays in every way, is being exploited
Whether it is a mother, sister, or wife
Fly as much as you can
but at last, you will have to come inside these cages
Sita once violated the boundary
The whole history changed,
Burnt in the fire, she had to go inside the earth
It’s not easy to get out of these boundaries
The luxuries of the cages bring us back to them.
We became a part of these cages
Father, brother, husband ,son are four enclosures
We have been given these boundaries from the day we were born.
If you leave them then you will get names like Black Ship of family, Blot on society
To follow their rules is our destiny.

एक औरत होने के मायने

यह मेरी व्यक्तिगत राय हो सकती है क्योंकि औरतों के हक की लड़ाई में महापुरुषों का ही सर्वप्रथम योगदान रहा। उन्होंने स्त्रियों को उनकी गरिमा और अपने अस्तित्व की रक्षा करने को सदैव उद्यत किया। भारत में स्त्री को पुरुषों से पहले रखा जाता था किन्तु आक्रान्ताओं ने हमें अपसंस्कृति के जाल में ऐसा उलझाया की हम अपना मूल स्वरूप ही भूल बैठे ! आज औरत होने के मायने बदल गए हैं। हमारी परवरिश ही हमें कहीं न कहीं दुर्बल बनाती है-

कितना भी किनारे रख दूं

इन बाड़ों को,

ये सामने आ ही जाते है

एक औरत होने के मायने

इन बाड़ों को किसी न किसी तरह स्वीकार करो ।

बचपन से लेकर मौत तक

ये सुरक्षा के बाड़े हमारा साथ देते हैं

इन बाड़ों की शर्तें भी होती हैं

जिन पर चलना एक औरत का नसीब है।

इन बाड़ों ने हम औरतों को अबला बना दिया!

अपनी कोख से विश्व को जन्म देने वाली

आज हर रूप में लहूलुहान है,

चाहे वह मां , बहन , या भार्या हों

सब इन बाड़ों की चक्की में पिसती ही हैं।

जितना ज्यादा उड़ लो आना है तुम्हें इन बाड़ों के अंदर।

सीता ने एक बार लांघी थी बाड़े की लकीर

पूरा इतिहास ही बदल गया,

अग्नि में झुलसकर धरती में समाना पड़ा।

आसान नहीं इन बाड़ों से निकलना

बाड़ों की सुविधाएं बाड़ों तक लाती हैं।

खुशी से हम भी इनके आदी हो चलें।

बाप ,भाई ,पिता , पुत्र चार बाड़े

हमें जन्म से मिले हैं।

इन्हें छोड़ा तो कुलनाशिनी , कुलटा जैसे नाम मिलेंगे

इनके फरमानों को अपनाना ही नियति हमारी।


वाजश्रवा के बहाने

“वाजश्रवा के बहाने” कवि कुंवर नारायण की अति प्रसिद्ध आख्यायिका है। आक्सफाम के एक सर्वे के अनुसार विश्व की आधी संपत्ति पर केवल एक प्रतिशत लोगों का कब्जा है। प्रोफेसर थामस पिकेटी के अनुसार अमेरिका, जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन में आर्थिक विषमता तेजी से बढ़ रही है। भारत में भी स्थिति कमोबेश वैसी ही है। कुंवर नारायण की पंक्तियों को जब मैं ने इस संदर्भ में उपयुक्त पाया तो इसे आपके समक्ष प्रस्तुत करने से खुद को रोक नहीं पाई

तुम्हें खोकर मैं ने जाना

हमें क्या चाहिए -कितना चाहिए

क्यों चाहिए, संपूर्ण पृथ्वी

जबकि उसका एक कोना बहुत है

देह बराबर जीवन जीने के लिए

और पूरा आकाश खाली पड़ा है

एक छोटे-से अहं को भरने के लिए।

धन्यवाद ।

आदमी

परिंदे घूमते हैं बेख़ौफ , खौफज़दा बस आदमी है।

बड़ी शख्सियत देखकर

न अंदाजा लगाना उसकी ताकत का

सुनहरे लिबासों में भी गमज़दा बस आदमी है।

चमकती सीढ़ियां कामयाबी की

बड़े चक्कर घुमाती हैं,

बुलंदी के आसमानों से भी गिरा बस आदमी है।

न कलमा न तस्बीह झूठे हैं,

बहुत हो गया कोसना रब को

सच तो ये है ,

खुदा की नज़र से गिरा बस आदमी है।

मिटा डाला जहां को

अपने जूनून की खातिर ,

इंसानियत और ईमान की निचली

पायदान पर खड़ा बस आदमी है।


Ravindranath Tagore’s translation in English


Whatever worship cannot be fulfilled in life, I am well aware that they have not been lost. The flower that has flown on the earth before blossoming, which loses its stream in the way of the river desert, I know well that they have not been lost. Whatever is left behind in life, whatever remains incomplete, I am well aware that it has also not been in vain. My future, which is still untouched, they are ringing in the string of your harp, I know well, they have also lost.


रविन्द्रनाथ टैगोर

जीवन में जो पूजाएं पूरी नहीं हो सकती हैं , मैं ठीक जानता हूं कि वे भी खो नहीं गई हैं। जो फूल खिलने से पहले ही पृथ्वी पर झड़ गया है, जो नदी मरुभूमि के मार्ग में ही अपनी धारा को खो बैठती है,-मैं ठीक जानता हूं कि वे भी खो नहीं गई हैं। जीवन में आज भी जो कुछ पीछे छूट गया है, जो कुछ अधूरा रह गया है, मैं ठीक जानता हूं कि वह भी व्यर्थ नहीं हो गया है। मेरा जो भविष्य है , जो अब भी अछूता रह गया है,वे तुम्हारी वीणा के तार में बज रहे हैं, मैं ठीक जानता हूं , ये भी खो गये हैं-

जीवने यत पूजा हतो न सारा,

जानि हे जानि ताओ हय नि हारा।

ये फल ना फुटिते झरेछे धरणी

ये नदी मरूपथे हारालो धारा।

जानि हे जानि ताओ हय नि हारा।

जीवने आजो याहा रयेछे पिछे,

जानि हे जानि ताओ हय नि मिछे,

आमार अनागत आभार अनाहत

तोमार वीणा तारे बाजिछे तारा।

जानि हे जानि ताओ हय नि हारा।।

– गीतांजलि

मुझे गुरु देव की ये पंक्तियां बहुत प्रेरक लगती हैं इसलिए इसे प्रस्तुत कर रही हूं। धन्यवाद ।

मृत संवेदना प्रखर प्रवंचना

महत्वाकांक्षा का मोती पलता है

निष्ठुरता के सीप में।

सहन नहीं कर पाता

अपने अवरोधों को ;

कत्ल कर देता है उनका

जो उसे खतरे का संशय लगते हैं ।

सफलता के ये कुतुबमीनारें

बनी हैं शोषितों के खून से ,

शाहों के जुनून से ।

“हर सफल यहां भावना का व्यापारी है”।

रेत ही रेत , नेहनिर्झर बह चुका है ।

अर्थ के प्रमाद , उन्माद का नित्य प्रदर्शन!

दिखती है बस-

“मृत संवेदना प्रखर प्रवंचना।”


सच या झूठ पता नहीं

वो बात तो झोपड़ी और सच्चाई की करते हैंमगर

कितने झोपड़ों से ताल्लुक रखते हैं?

हमारी सादगी उन्हें गरीबी लगती है।

लोग रंगों की परतों में

सीरत कहां परखते हैं?

झूठ में हम तुम बस

रचे बसे रहते हैं।


लंका स्वर्णमई भी जल गई

बड़ा अभागा था विभीषण

रोक सका ना राघव प्रलय

नीति पथ और धर्म का

हर पग पर करता पालन।

अहंकार बीज देता है स्वर्णिम फल

पर उपजता नाश भूमि पर सकल।

दस शीश चढ़ा रावण ने

मनोहर रचा महल,

जानता था बंधु उसका यह

सीता सती का अभिशाप

खा जाएगा पूरा वैभव

नष्ट करेगा राक्षस जाति को।

बार-बार जान अनिष्ट को

मनाता रहा मानी अग्रज ।

उसने अपमान गरल पीकर

जब छोड़ा लंका घर

देखा नाचते काल को

लंका और रावण के सिर पर ।


शब्द ही ब्रह्म है

शब्द है ब्रह्म रूप

अर्थ उसका प्रकाश

शब्द अर्थ से परे

नहीं जीवन – विकास ।

हम बोल रहे हैं अनवरत

खोल रहे हैं खुद को

वह जो चुप है वीर वही

शब्दों से हारा जो व्यक्ति नहीं ।।


पी कहां – पी कहां

प्राण पपीहा पूछ रहा है

पी कहां – पी कहां . . . .

अतृप्ति , बेचैनी , जिजीविषा बलवती फिर भी

हर रोज मांगना

प्यास फिर भी ,

घन आए लाए नेह जल

किंतु नहीं मिटती प्यास अमर ।

पी – पी कर भी

प्राण पपीहा टेरता रहता

पी कहां – पी कहां ।।


अब जीत की बारी है

गुल की चाह है तो

कांटो को भी सहना होगा

सुख की छाव है तो

दुखों को भी सहना होगा

जीवन के इस धूप छांव में

हर शख्स जूआरी है

कभी हार कर भी

दाव लगाते हैं हम

हार के बाद जीत की बारी है ।


परीक्षा भवन

हाथ में पश्नपत्र लिए

सवालों के सुलझे – अनसुलझे

गुत्थ – म – गुत्थ में उलझे

कुछ जवाबों को हल करते

कुछ को टालते

कभी आत्मविश्वास से गौरवान्वित

कभी हार के डर से

शू्न्य को निहारते

समय की पाबंद आंखों में

टकटकी से निहारते

तभी घड़ी ने कहा –

आपका वक्त पूरा हुआ ।


मन

मन भटकाता है

मन विरमाता है

हर काम से पहले

मन हमको आजमाता है।

जीतूंगा या हारूंगा

जय पराजय के संशय में

मन हमको उलझाता है

क्या सही या है गलत

झूठ सच के द्वंद में

मन भटकाता है , मन विरमाता है।

साहसी का बल

दुर्बल की कमजोरी

आलस्य का घर या शक्ति का आगर।


भरम ही भरम

हम नाहक ही सबको अपना समझते रहे

छोटी सी मुट्ठी में जहां नहीं समाता।

चांद दूर ही रहे तो सही

पास जाकर कहीं टूट न जाए

उसकी सुन्दरता का भरम।

कभी भरम को भी ढोओ ,

शायद सच का सामना

करने की हिम्मत न हो।

कायर हम सब हैं ।

कायरता में भी साहस का भरम।

जहां देखती हूं पाती हूं भरम ही भरम।


विचार क्यों नहीं आते

क्यों विचार लिखते समय

साथ नहीं देते

वे सुखद स्मृतियों की तरह,

काफूर हो जाते हैं।

वे आते हैं जब धोती रहती हूं,

बच्चों के कपड़े।

वे आते हैं जब करती रहती हूं,

घर के खर्च का हिसाब।

वे आते हैं जब बज रही होती है,

कुकर की सीटी।

जीवन की इस आपाधापी में-

काव्य साधना भी आसान नहीं।


हम आधुनिक है

दूर से आती

किसी विदेशी ब्रांड के परफ्यूम की खुशबू

चाह जगी देखा तो थी शिखा सजी

छोटे टॉप पर टाइट जींस

हल्के लिपस्टिक ,मस्कारा के साथ

बालों को ढीला बांध लगा ली मैच की बिंदी।

बालकनी से झांक -झांक

कह रही थी ‘स्टुपिड नहीं आया अभी’।;

सीढ़ी से उतर रही थी जब –

आकुलता देख पूछा बरबस

कहां जा रही हो? वह भी इस निखार के साथ!

तमतमा कर बोली –

‘फेर दिया पानी सारी मेहनत पर

बना काम बिगाड़ दिया टोक कर’।

मैं झेंप बोली – ‘सॉरी एक्स्ट्रीमली सॉरी’!

उस ने चेतावनी दी झिड़की के साथ-

‘दिस इज बैड मैनर’।।


तारीख

तारीखों का फैशन सा चल पड़ा है

जन्म से लेकर मृत्यु तक

हर क्षण का मूल्य हम चुकाते रहते हैं।

एक तारीख़ का अनुभव

क्या कभी दूसरे से मैच करता है?

कुछ तारीखों हमें मालामाल करती हैं,

वहीं कुछ कंगाल कर जाती हैं

कुछ का मलाल हम जीवन भर ढोते हैं।

तारीखों का चलन निभाते-निभाते

एक दिन हम भी तारीख़ बन जाते हैं।


बापू अब तुम ही बोलो

Image Credit: Google

चेहरे से मानुष हैं सब

संवेदन रहित ह्रदय के करतब।

छल छद्म द्वेष के शिकार।

हर पग पर हो खुद का विस्तार

साजिशों की घीनौनी हरकत।

मिटा कर बड़ी लकीरें

काट कर गला किसी सरल का

बन गए सफलता के शिखर

‌‌ उजाड़ दिया भारती के कानन को।

सभ्य वसनों में , भोली शक्लों में –

पाया वही पुराना तुच्छ मरकट।

अहंकार अब विद्या भूषित

नम्रता ज्ञान से शायद चली गई।

दादुर ही अब बोल रहें

सुनती कोयल होकर मौन

ढूंढ रही वह अपना ठौर।

करील हीअब नियति हमारी

सूख गए आम्रतरुवर‌ सब।

बापू तुम ही बोलो ।

अब तो मौन तोड़ो

क्या तुम हो खुश देख दुगर्ति –

अपनी जननी की?

रो रही है मां , गांधी , सुभाष अब कहां?

रागी पुत्रों ने मुझको –

सचमुच कर दिया अबला ।।


मां

मां ईश्वर की सबसे सुंदर कृति है।

मां दुनिया की सबसे बेहतर अभिव्यक्ति है।

मां ममता से सारी दुनिया चलती है।

मां संसार शिशु की लोरी थपकी है।

मां सृष्टि का नींव आधार है।

बिना मां कहां संसार है?

मां अर्चना वंदना मंत्र जाप है।

मां ईश्वर की छाप है।

मैं नत मां के चरणों में सदा।

उससे बढ़कर दुनिया में कोई ढाल कहां।


रूई

कितनी शुभ्र थी मैं

आज नहीं वह कल था

युवा जमाव न था

वह शैशव कोमल था।

जन्म से ही पीरों ने

शायद मुझ में जन्म लिया था।

दुख की खेती से उपज

मैं शुभ्र हुई मनोरम।

किसी ने बच्चे की तरह

खेला जी भर मुझ से।

कभी उड़ाता कभी फाड़ता

इतने पर भी ना भरा मन

बनाया ढेर मेरा उस पर लेट गये।

मैं कोमल मसली जाती रही।

रोकर , हंसती , कहती-

तुम्हे सुख तो मिला खेल का!

मेरा क्या , ‘ मैं वस्तु उपयोग की।’


आधुनिक प्रेम

रस्मोरिवाज चलते रहेंगे

हम तुम मिलते रहेंगे

शायद कभी एक ना हो सकेंगे ।

वफा ना तुम में ना मुझ में

जिस्म फिर भी मिलते रहेंगे।

तलब हुई तो किया

प्यार वफ़ा का इकरार

वरना एक झटके में छोड़ चले

हो गए कहीं और गिरफ्तार।

हम उनको वह हमको

अपना ना कह सकेंगे

चाहे जितना जता लें प्यार ,

एक दूसरे पर शक ही करेंगे ।


असलियत

बहुत रोए जानकर असलियत

शायद भरम ही ठीक था

मत मुखौटों को उठाओ अब

जानती हूं कत्ल करने वाला –

ईमान का ; मेरा ही मीत था ।

शिनाख्त पैरवी करूं कैसे ?

अनजाने ही मैंने ना जाने –

कितने अपराधों को शह दिए…..।


पीड़ा ही प्रेरणा सर्जक की

वेदना अनजाने ही आती है

लिए साथ अपने गीत कई ।।

शब्द कुछ अंदर ही घुट रहे हैं

पीड़ा उभरी उपजा आह

श्वासों में उम्मीदें कुछ

शब्द बुन रहीं हैं

शब्द जब जुड़ जायेंगे पीड़ा से

अपने आप ही बन जाएगा गीत

पीड़ा ही प्रेरणा सर्जक की ।।


बाजार

पहले तो ईमान को बेचा

अब अंदर के इंसान को बेचो!

यौवन बगिया में आग लगाकर

मासूमियत के भगवान को बेचो।

बाजार बन गई दुनिया सारी

बिकें तन यौवन के

बचपन की मुस्कुराहट भी

अब मंडी में सज आई।

मौसमी फल सब्जियां बन गया

अब देखो इंसान भाई !


सुविचार

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१.

“ ख्वाहिशें आजमाइश करती हैं हमारे इरादों की ।

बुलंदियां मिलती है‌ हौसलों की उड़ानों से।

रब भी मेहरबान उन्हीं पर अक्सर ;

जिनकी कोशिशें घिसती हैं खुद को तराश के पैमानों पे।


२.

“हम इतने भी बेगैरत नहीं जिंदगी

कि तू रूठेगी हम हर रोज मनाएंगे ।


३.

“बीता हुआ कल किसने फिर देखा ,

कल और परसों की चिंता में

आज क्यों गवाएं हम। ”


४.

“ गीता-बाइबिल-कुरान और अरदासों

से अगर इंसानियत सीख लेते –

इनके नुमाइंदे तो

दुनिया में मजहब के नाम पर

कभी कोई फसाद नहीं होता । ”


५.

“ हर सितारा कुछ कहता है

उसकी चाल बदलने की जगह

अपनी राह बदलो। ”


६.

“ ना जिंदगी से कुछ ज्यादा मांगा

जो उसने दिया उसका गम था।

‌‌ हर बात से ज्यादा भरोसा

अपने बाजू -ए- दम पर था। ”


७.

हारने के खौफ से क्या

नया न करने वाले जीत जाते हैं।

हौसलों ने समन्दरों को नापां है गगन को चुमा है।

इरादें ही चट्टानों के बीच से अपना

रास्ता निकाल लेते हैं।

कोशिश ही है जिससे हम अपना

मुकद्दर संवार सकते हैं।