प्रतिमानाटकम् से आज तक

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प्रतिमानाटकम् का प्रथम अंक जिसमें भास अपनी मौलिकता का परिचय देते हुए परिहासवश सीता को वल्कल पहनते हुए दिखाते है। प्रसंग यह है कि राज्याभिषेक से पूर्व एक सखी कुछ वल्कल (गेरुआ साधु के वस्त्र) लेकर आती है। सीता को यह वस्त्र बहुत सुंदर लगते हैं। सीता उन्हें पहन लेती हैं।

उसके उपरांत कुछ देर बाद राम आते हैैं । राम भी वल्कल पहनना चाहते हैं। सीता राम को मना करते हुए कहती हैं- “आर्य आपका राज्याभिषेक होने वाला आप इसे नहीं पहन सकते। यह अपशकुन होगा”। राम सीता से आग्रह करते हुए जो तर्क देते है वह बड़ा समीचीन है – “देवी तुमने स्वयं वल्कल पहन कर मेरे आधे शरीर को तो वल्कल पहना ही दिया है। अब इसे पूर्ण कर दो।”

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Happy Gandhi Jayanti!!

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आप सभी को गांधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। इस शुभ पर्व पर हमारे प्यारे बापू का जन्म हुआ था। इस पावन अवसर पर मैं अपनी कविता ‘बापू अब तुम ही बोलो’ को पुनः प्रस्तुत करना चाहूंगी :-


चेहरे से मानुष हैं सब

संवेदन रहित ह्रदय के करतब।

छल छद्म द्वेष के शिकार।

हर पग पर हो खुद का विस्तार

साजिशों की घिनौनी हरकत।

मिटा कर बड़ी लकीरें

काट कर गला किसी सरल का

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