मृत संवेदना प्रखर प्रवंचना

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महत्वाकांक्षा का मोती पलता है

निष्ठुरता के सीप में।

सहन नहीं कर पाता

अपने अवरोधों को ;

कत्ल कर देता है उनका

जो उसे खतरे का संशय लगते हैं ।

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धर्म कहां है?

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मैं पूछती हूं खुद से अक्सर

धर्म कहां है ?

पूजा , विविध व्रतों , उपवासों में

पुरोहित या धर्म गुरुओं के पास

नैष्ठिक अनुष्ठानों या कर्मकांडों में

उपासना के बिके हुए फूलों में

हमारे दिखावटी उसूलों में।

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Happy children’s Day

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छलक रहा था स्नेह अमल दृगपटों से

अनभिज्ञता झांक रही थी अक्षकोरों से।

अपनी धुन में था बेपरवाह,

समझता खुद को शहंशाह

अल्हड़ता ,चंचलता और मस्ती में।

वह गुम था अपनी बस्ती में।

यह बस्ती नहीं मजहबी

वह तो था निरपेक्षी।

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🎆Happy Deepawali🎆

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नमस्कार दोस्तों। इस पावन पर्व पर में आप सबके समक्ष अपनी एक कविता प्रस्तुत करना चाहती हूं:-

कपड़े, मिठाई और पटाखे खरीदकर,

त्यौहार के लिए तैयार हो जाएं।

दुख के अंधेरे दूरकर,

खुशियों के दीप जलाएं।

दीपावली की आपको हार्दिक शुभकानाएं।

नफरत को दिल से दूरकर,

परायों को अपना बनाएं।

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